Followers

Friday, 5 June 2026

मस्त शायरी

 मोटीवेशनल शायरी 

परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है
 ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है
मिला है हुस्न तो इस हुस्न की हिफ़ाज़त कर
 सँभल के चल तुझे सारा जहान देखता है
कनीज़ हो कोई या कोई शाहज़ादी हो 
जो इश्क़ करता है कब ख़ानदान देखता है
घटाएँ उठती हैं बरसात होने लगती है
 जब आँख भर के फ़लक को किसान देखता है
यही वो शहर जो मेरे लबों से बोलता था
 यही वो शहर जो मेरी ज़बान देखता है
मैं जब मकान के बाहर क़दम निकालता हूँ 
अजब निगाह से मुझ को मकान देखता है

शकील आज़मी

No comments:

Post a Comment

मस्त शायरी

  मोटीवेशनल शायरी  परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है  ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है मिला है हुस्न तो इस हुस्न की हिफ़ाज़त कर  सँभल के ...