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Friday, 10 April 2026

संवेदना

 संवेदना

कौन है जो दूसरों को दुःख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरों से दुःख उसका ले सकेगा?


क्यों हमारे बीच धोखे का रहे व्यापार जारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी ? क्या करूँ?


क्यों न हम लें मान, हम हैं चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला, दुःख नहीं बँटते परस्पर

दूसरों की वेदना में वेदना जो है दिखाता,
वेदना से है मुक्ति का निज हर्ष केवल वह छिपाता
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तुम दुःखी हो तो सुखी मैं विश्व का अभिशाप भारी 
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी ? क्या करूँ?

हरिशंकर परसाई 

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